Thursday, 12 October 2017

गाँधी , शास्त्री , लोहिया और जे पी - मेरे लिए

कल  जय प्रकाश नारायण की जन्म तिथि थी । आज राम मनोहर लोहिया की पुन्य तिथि। और इसी अक्टूबर में २ तारीख को महात्मा गाँधी और लाल बहादुर शास्त्री की जन्म तिथि।  अख़बार , टीवी और वेब पोर्टल से कुछ हटकर एक सामान्य व्यक्ति के तौर पर इन्हे जैसा जाना समझा है वही साझा कर रहा हूँ। 

महात्मा गाँधी , शास्त्री और लोहिया को मैंने देखा नहीं है। उनके जीवन और कर्म के बारे में मेरा ज्ञान किताबी और अखबारी ही रहा है। 

जय प्रकाश नारायण यानि जे पी को मैंने देखा है। मुझे इनके होने की अनुभूति भी हुई है। पहली और आखिरी बार मैंने जे पी को श्री कृष्णा मेमोरियल हॉल पटना में देखा जहाँ उनका शव अंतिम दर्शनों के लिए रखा हुआ था। लेकिन जे पी की धमक हमारे घर में संपूर्ण क्रांति के आंदोलन और इमरजेंसी के  दौरान हो चुकी थी क्योंकि मेरे बड़े भाई श्री अमरेश नंदन सिन्हा इस ऐतिहासिक घटना क्रम के सक्रिय भागीदार भी रहे और इसी दौरान उनका जेल प्रवास भी हुआ। बाबूजी का नैतिक और मौन समर्थन आज भी याद आता है। यह तो हुई व्यक्तिगत और पारिवारिक बात। 

इन चारों  के बारे में जितना मैंने जाना है उस से मेरे अंदर विस्मय का बोध होता है। कुछ कुछ वैसा जिसे अंग्रेजी में Awe & Wonder कहते हैं। विशेषकर आज के सन्दर्भ में। अज्ञेय ने कहा था - दुःख मांजता है। यह कथन इन चारों पर पूरी तरह चरितार्थ होता है। लेकिन मेरे विस्मय बोध का कारण यह नहीं है। सामान्य जीवन में दुःख की जो अवधारणा है ये चारों व्यक्तिगत रूप से उस से पार पा चुके थे। लेकिन जीवन में व्यक्तिगत सुख खोजने की जगह इन्होने जन जीवन का दुःख आत्मसात कर लिया था। दूसरों का दुःख आत्मसात करने का उनका  तर्क चाहे जो भी रहा हो लेकिन मेरे जैसे आम इंसान के लिए तो एक अजूबा ही है। क्रांति सदैव हुंकार ही नहीं भरती बल्कि  वह उद्दात्त -चित्त , उदार, गरिमामयी, करुणापूर्ण और गंभीर भी होती है। 

गाँधी अपने जिस गुण के कारण मुझमे विस्मय बोध कराते  हैं वह है साधन और साध्य की शुचिता पर जोर। साध्य के शुचिता की अवधारणा एक राजनितिक दर्शन  रूप में भारत में आज भी शैशव अवस्था में ही है। इसका मुख्य कारण व्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी रखने की इच्छा है।सफल होने की हड़बड़ी और तात्कालिकता के महत्व ने साधन की शुचिता के महत्व को न सिर्फ राष्ट्रीय जीवन से बल्कि दैनिक जीवन से भी लगभग गौण कर दिया है। 

कहते हैं सत्ता मद मस्त करती है और सम्पूर्ण सत्ता पूर्ण रूप से मद मस्त। लाल बहादुर शास्त्री ने इस कथन को पूरी तरह गलत साबित कर दिखाया। १९६५ के युद्ध में भारत की विजय ने न सिर्फ १९६२ की हार के दाग को धोया बल्कि १९७१ के जीत की नीवं भी रख दी। भारत को आर्थिक आत्मनिर्भरता की प्रेरणा शास्त्री जी के जय किसान से ही मिली थी। सत्ता के शिखर की यह विनम्रता विस्मय बोध कराने के लिए पर्याप्त है। 

लोहिया एक प्रबुद्ध और प्रखर सोच वाले ठेठ देहाती। दिमागों के शहरीकरण का जिस समय भारत में बीजारोपण हो रहा था उस समय गांव , खेत-खलिहान , फावड़ा की बात करना बड़े साहस की बात रही होगी। जब पूरा भारत नेहरू के आभामण्डल से चकित - विस्मित - विस्फरित हो रहा था उसी दौरान एक व्यक्ति देश के अनगढ़ और खुरदुरी सच्चाई को चीख चीख कर बता भी रहा था और चेतनाओं को झकझोर भी रहा था बगैर किसी व्यक्तिगत ईर्ष्या या शाब्दिक अमर्यादा और कड़वाहट के। इस तिलस्म से विस्मित हो जाना मानवीय रूप से सहज है। 

जय प्रकाश - यानि वह जिसने मानवीय अभिव्यक्ति की गरिमा स्थापित की। और वह भी जन भागीदारी के माध्यम से। एक ऐसी चेतना जो उस हर राह पर चलने के लिए सदा सहर्ष तैयार रही जो मानवीयता की गरिमा को बचा बना सके। सफलता और असफलता के प्रति निरपेक्ष भाव रखते हुए। जे पी जिन्होंने आजाद भारत को पहली बार यह बताया की सत्ता व्यवस्था का समुच्चय है अतः परिवर्तन की अपेक्षा व्यवस्था में होनी चाहिए न कि सत्ता में। 

इच्छा है कि आजीवन विस्मित रहूँ इन चार मनीषियों के विचार दर्शन से। 

करुणेश 
पटना
१२। १०।२०१७




Friday, 8 September 2017

उद्वेग का आलेख

गौरी लंकेश को मरने से पहले मैं नहीं जानता था। राम रहीम प्रकरण से पहले मैं पत्रकार छत्रपति को भी नहीं जानता था। मरने से पहले मैं दैनिक हिंदुस्तान के पटना संस्करण के पत्रकार राजदेव रंजन को भी मैं नहीं जानता था। मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले के शिकार पत्रकारों और आर टी आई कार्यकार्यताओं को भी मैंने   मरने के बाद ही जाना। इतना ही नहीं कलबुर्गी , पनसारे और दाभोलकर को मैंने उनके मरने के बाद ही जाना। इस से मुझे कमतरी का अहसास तो होता है मगर अपराध बोध नहीं। उलटे इन जैसों के बारे में जानने की भूख और भी बढ़ गयी है। 

बहु प्रचारित नक्सलों की हत्या , माओवादियों की हत्या , राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ समर्थित कार्यकर्ताओं की हत्या , विभिन्न राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं की हत्या के मृतकों को भी मैं नहीं जानता हूँ। इनके बारे में भी जानने की उत्सुकता होती है मेरे अंदर मगर सच यह है कि यह उत्सुकता वैसी नहीं होती जैसी पहले पैराग्राफ में नामित व्यक्तियों के बारे में होती हैं।

मेरे मन में एक सवाल उठता है। क्या मेरी मानवीयता खंडित हो जाती है। क्या मेरी संवेदनाएं पक्षधर हो जाती है। मुझे  ऐसा नहीं लगता। यदि उपरोक्त सभी मृतकों के कार्यों और उनके द्वारा अपनाये गए साधनों की शुचिता और वैधानिकता का तार्किक और निरपेक्ष मूल्यांकन करूँ तो स्वाभाविक निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि ऐसे लोगों की हत्या जो यथार्थ की तर्कपूर्ण अभिव्यक्ति के माध्यम भर हों समाज और राष्ट्र के लिए पीड़ादायी भी है और अमूल्य क्षति भी। हमें सत्य के उस कठोर पक्ष को सुनने , कहने और लिखने को ग्रहण करने की सहिष्णुता और उदारता अपने अंदर पैदा करनी होगी। साथ साथ असत्य के शोर और धारणाओं की अवैज्ञानिक तार्किकता के तकनिकी व्यामोह से भी बचना होगा। ऐसा सभी कर सकते हैं इसकी अपेक्षा दिवा  स्वप्न मात्र है और इसी लिए उनका बचे रहना और बोलते कहते लिखते रहना  भी ज्यादा जरूरी है जो आपको मात्र शब्दों के सहारे रौशनी के दीये जलाने का काम कर रहे हैं हमारे दिमागों में।

सत्य निष्ठां और विचार निष्ठा का अंतर समझना ज्यादा जरूरी है। विचार एक समय के बाद रूढ़ हो जाते हैं। सत्य अपने आप को बदलती परिस्थितियों और समय में विरोधाभासी विचारों में स्थापित कर लेता है। आप कृष्ण कथा पढ़ें या राम कथा , बुद्ध कथा पढ़ें या महावीर कथा एक ही बात स्थापित होती है सत्य समय सापेक्ष होता है और विचार व्यक्ति सापेक्ष। किसी भी तर्क से समय की महत्ता व्यक्ति से अधिक होती है इसलिए सत्य को प्रकट होने दें क्योंकि यह समय सिद्ध है। इसे रोकना समय को रोकना होगा जो किसी मनुष्य , सरकार , समाज या राष्ट्र के वश की बात नहीं।

और अंत में मेरी वर्तमान परिस्थितियों पर लिखी कविता

शुक्रिया मेरे कातिल 
सौ बार शुक्रिया 
मेरे सच के सबूत तुम 
सौ बार शुक्रिया। 

मेरी कब्र के अँधेरे 
इतने भी नहीं गहरे 
मेरे चारों तरफ है 
रौशनी के पहरे। 

अफ़सोस बस है इतना 
मारा क्यों गोलियों से ?
लफ्जों की मुफलिसी से ,
मुर्दों की टोलियों से ?

कुछ ऐसा तुम भी करते 
कुछ ऐसा तुम भी कहते 
न मैं रौशनी में मरती 
न तुम अंधेरों में रहते। 

सच की शिकायत सच में 
की हीं कहाँ थी तुमने 
तुमको गिला यही न 
कि पूछा नहीं था तुमसे। 

सच में मुझे बताना 
सच - सच ऐ मेरे कातिल 
क्या मारने से पहले 
तुम्हारे सच ने था ये पूछा 
कि गोलियां चलें क्या ?

करुणेश  
पटना
०८। ०४। २०१७

 

Monday, 4 September 2017

एक विचार

बचपन में हमें पढ़ाई नहीं अच्छी लगती है। जवानी में हमें विवेक और विनम्रता नहीं पसंद आती। अधेड़ उम्र में हमें ज्ञान नहीं भाता। और बुढ़ापे में हमें तकनीक नहीं पसंद आती। इन चार नापसंदगियों के साथ हमारा समाज बनता है अपवादों को छोड़कर। 

आइये ठीक इसका उल्टा सोचें। बचपन को खेल पसंद है। जवानी को उत्साह और तात्कालिकता। अधेड़ उम्र को धारणाएं पसंद आती हैं। और बुढ़ापे को इतिहास। 

आज के समाज को देखकर मुझे कभी कभी ऐसा लगता है जैसे एक समाज में चार अलग अलग समाज एक साथ रह रहे हैं विचार आचार और व्यव्हार के स्तर पर। समाज के इन चार रूपों में एक अन्तर्सम्बन्ध भी है और अंतर्द्वंद्व भी। लेकिन हम में से अधिकांश पसंदगी या नापसंदगी के इन्ही पड़ावों से गुजरते हुए अपनी अपनी जीवन यात्रा पूरी करते हैं। 

क्या पसंदगी - नापसंदगी के क्रम को जीवन वय के विभिन्न चरणों में उलट पुलट कर कुछ बेहतर हासिल किया जा सकता है ? या यह मात्र एक कौतुक भरा विचार है। 

शायद इस पर सोचा जा सकता है।  

करुणेश 
पटना 
०४। ०९। २०१७ 

Friday, 1 September 2017

माई

(माई की कल यानि २ सितम्बर को पुण्य तिथि पर सादर )

पूज्य माई

सादर प्रणाम 

बाबूजी के चिट्ठी लिखले रहीं। ओकरा से तोरा सबके समाचार मिलिए गईल होई। वैसे सबके हाल ठीक बा। अउर चाल त तू सबके जानते बाड़ू त हम का लिखीं।

तोरा गइला से दू गो बात के तकलीफ हो गईल। अइसन हमरा लागेला। अउर लोग के नइखी जानत। ए गो जीभ के स्वाद आ दूसर बतकूचन। बाबूजी त सुनते ना रहन। आ जादे कह द त अल्लड़ - बल्लड़ कह देत रहन ओकरा के। 

ई बात नइखे कि अब खाना में स्वाद न मिले लेकिन बने से पाहिले एके तकारी के कतना तरीका से बनावल जा सकेला एकर कहानी कहे वाला अब कोई नइखे आ ना कोई के मन लागे ई सब कहे सुने में। मीट मछरी बनावे के तौर तरीका आउर ओकर किस्सा कहानी त तोरे साथे गुजर गईल। 

जउन  दोसर बात जेकर कमी हमरा खलेला उ बा गलत कहे आ करे के आजादी। अब त भाइयो बहिन में कुछ गलत कह सुन देता त रिश्ते ख़तम हो जाये के डर लागल रहेला। भौजाई आ बहनोई के बात का कहीं। तू रहिस त तोरा से कुछो कह सकत रहे आदमी। गलती करे के भी हिम्मत रहे आ गलती कहे के भी। जानते रहे आदमी कि कुछो क के तू सब संभार लेबे। और संभार लेते रहे तू। खाली हमरे खाती न कोई खाती। तोरा खातिर गलती सही से जादे जरूरी रहे सबके एके साथे रखल। तबे त आज तक निभता कम बेस कर के। आ आगे भी निभिये जाइ। 

ले हम त बाते फिंचे लगनी। जाए दे। तोरे से न कह तानी। आउर सब ठीके बा। 

जइसे बाबूजी भर जिंदगी गोदना गोदत (लिखत - पढ़त ) रह लन उही लच्छन हमरो ह। तू ही न कहत रहे - दर्ज़ी के बेटा जब तक जीवे तब तक सीवे।   

बाकी तोर आशीष। 

तोहार 
" कपिल मुनि "

करुणेश 
पटना 
०१। ०९ २०१७ 

Saturday, 26 August 2017

भारतीयों को शर्म नहीं आती

यह देश बेशर्म नागरिकों का देश है। ऐसा कहने में मुझे कोई संकोच नहीं हो रहा। और हो भी क्यों ?

जिस देश में साठ से अधिक शिशु वहां मरते हैं जहाँ उन्हें जिंदगी देने की व्यवस्था की गयी है। पूरी राज्य व्यवस्था मौतों पर मात्र फूहड़ नौटंकी करती है चंद घंटों के लिए नहीं बल्कि दिनों तक। स्वाधीनता दिवस के अवसर पर  राष्ट्र को सम्बोधित करता प्रधानमंत्री एक लफ्ज भी शिशुओं की मौत पर नहीं बोलता। और हम भारतीय जय - जय में लगे हैं। किसी को यह नहीं सूझा  कि झंडोतोलन और राष्ट्रगीत के बाद दो मिनट का मौन ही रख ले उन शिशुओं की मौतों पर। आंसू बहाने का जिम्मा उन शिशुओं के माँ बाप तो उठाएंगे ही। हम भारत के लोग भला ऐसा क्यों करें ? हमें शर्म नहीं आती। 

सप्ताह दस दिनों के अंदर दो रेल दुर्घटनाएं होती हैं। शायद हम सोचते हैं ऐसा तो होता ही रहता है। फ़िल्मी भाषा में कहें तो " बड़े बड़े देशों में छोटी छोटी बाते होती ही रहती हैं। क्या फर्क पड़ता है। और शर्मिंदा होना वह भी ऐसी छोटी बात के लिए भला समझदारी है क्या ? प्रभु जी ने तो त्याग पत्र सौप ही दिया है। महाप्रभु की स्वीकृति का इंतजार है। और क्या कर सकते हैं बेचारे। हम क्यों शर्मिंदा हों हमारी थोड़े ही गलती है। एक दम सही। होना भी नहीं चाहिए। होना भी यही चाहिए। हमने त्यागपत्र को शर्म पत्र मान लिया है। 

एक सांस में तीन तलाक को सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध घोषित कर दिया। यह हिंदुत्व की जीत है। यह सरकार की जीत है। यह संघ की जीत है। इसके बाद भी जीत की मात्रा बची हो तो उन महिलाओं के दे दें जिन्होंने यह संघर्ष किया। लेकिन क्या मात्र जीत की भावनाओं के साथ जीवन जिया जा सकता है। हमें क्या ? हमने तो इस फैसले के पक्ष में सोशल मीडिया पर लाइक , ट्वीट और रीट्वीट कर ही दिया है। २०१९ के प्रजातान्त्रिक महापर्व में स्थान और समय के अनुरूप इसका कौशल के साथ उपयोग राजनीति कर ही लेगी। और हम इस या उस खेमे में होंगे अपना वोट देते हुए। एक नागरिक का वोट राजनितिक दलों की करनी का समर्थन नहीं होता। फिर भी ऐसा ही होगा। हमने आर्ष वचनों , परम्पराओं और प्रतीकों को अतार्किकता की हद तक बचाये रखने , निभाने और आगे बढ़ाने का संकल्प जो उठा रखा है। चाहे ऐसा करने में संविधान की धज्जियाँ क्यों न हो जाए। कितने भारतीयों को यह पता है कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक से वैज्ञानिक सोच को अपनाने और प्रचार - प्रसार करने की अपेक्षा रखता है। लेकिन संविधान की उपेक्षा शर्मिंदा होने का कोई कारण तो नहीं। 


बलात्कार , हत्या और यौन हिंसा के दोषी को  बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह कहा जाता है। कोई उसे बलात्कारी और हत्यारा कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा। पूरी मीडिया बिरादरी पत्रकार स्वर्गीय छत्रपति के गुण गान करते नहीं थक रही लेकिन वैसा होने का साहस इक्का दुक्का ही कर पाते हैं। राजनीति ने मौन धारण कर रखा है। एक शहर जला। न्यायलय चीखती चिल्लाती रही। व्यवस्था का शिखंडी स्वभाव दर्शनीय रहा। अगली सुबह पचकुला के शहरवासी मॉर्निंग वाक पर भी निकले। शमसान में अर्ध रात्रि का सन्नाटा भी इतना भयावह शायद ही हो। पर सबने सोचा चलो अभी के लिए बला टली। अब २८ अगस्त को देखते हैं क्या होता है। हम मान चुके हैं कि ऐसा ही होगा। सामूहिक बेशर्मी का ऐस उदाहरण भला कहाँ मिलेगा। 

 भारतीय राजनीति का प्रतिपक्ष साझी विरासत बचाने की बात कर रहा है। और वह भी ऊंघते हुए अनमने ढंग से। क्या गलत है इसमें। ऊंघते अनमने नागरिकों वाले भारत को चाहिए भी यही। एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले देश को शायद सब कुछ मिल जाए पर मिलेगा शर्म खोकर ही। 

इसलिए भारतीयों को शर्म नहीं आती। जरूर दो चार लाख लोग इस श्रेणी में नहीं आते लेकिन बेशर्मी के इस महासागर में दो चार लाख मीठी बूंदें क्या कर लेंगी सिवाय कुछ लोगों में उत्साह भरने और बाकियों में आशा जगाने के। 

करुणेश 
पटना 
२६। ०८। २०१७ 





Saturday, 29 July 2017

बदलाव

बिहार में सत्रह घण्टों के अंदर सत्ता बदल गयी। नहीं , सच ये है कि सत्ता के चेहरे बदल गए। कारण और परिस्थितियां सर्व ज्ञात हैं और परिणाम भी। 

चेहरों के इस बदलाव को मैं एक आईने की तरह देखता हूँ। इस आईने में भारतीय राजनीति का जो चित्र उभर रहा है वह बहु आयामी न होकर द्वी ध्रुवीय दिख रहा है जिसके एक सिरे पर साम्प्रदायिकता है तो दूसरे सिरे पर भ्रष्टाचार। भारतीय राजनीतिज्ञों को जनता को देने के लिए यही दो चीज़ें हैं। जनता की मजबूरी है कि इनमे से ही कोई एक चुने। यह और ज्यादा तकलीफदेह है कि जन संवाद , बौद्धिक संवाद और पत्रकारीय संवाद - ये तीनों भी द्वी ध्रुवीय हो गए हैं और इसीलिए संवादों में गरिमा , गांभीर्य और विवेक का ह्राष उत्तरोत्तर  दिख रहा है। 

भ्रष्टाचार का अर्थ मात्र आर्थिक भ्रष्टाचार नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि आर्थिक भ्रष्टाचार के कारण ही सामाजिक विषमता और विद्वेष पैदा होते हैं। सामान्यतः सारे जन असंतोष के मूल में आर्थिक भ्रष्टाचार ही होता है। सत्ता व्यक्तिगत आर्थिक भ्रष्टाचार का शमन , दमन या प्रोत्साहन मात्र ही कर सकती है। किन्तु भ्रष्टाचार जब विचार का रूप लेकर संस्था बन जाए तो जनता भ्रमित हो जाती है। हम भ्रम की ऐसी ही परिस्थितियों के साक्षी बन रहे हैं। पढ़ने , देखने और सुनने में ये विचार बड़े सम्मोहक लगते हैं और इनके सम्मोहन का जब तक एक्सपायरी डेट आता है तब तक हम इसके शिकार हो चुके होते हैं। 

सम्प्रदायिकता कोई सोच नहीं बल्कि एक व्यव्हार है। लेकिन व्यहार का अर्थ स्वाभाविक मानवीय व्यवहार नहीं। मेरी समझ में यह एक प्रतिक्रियात्मक व्यव्हार (Reactionary Behaviour) है। सामान्यतः मनुष्य दो स्तरों  पर  जीता है - पहला शरीर के स्तर पर और दूसरा विश्वास के स्तर पर। मनुष्य के विश्वास का जब उग्र एवं अपमानजनक खंडन होने लगे या अतार्किक अति महिमांडन होने लगे तो तो सम्प्रदियकता की विष - बेल  उगती है। यह विष बेल परजीवी पौधे की तरह सामाजिक संरचना के तने के  चारों ओर लिपट जाती हैं और तने  से होकर टहनियों और पत्तों में जाने वाले सहजीवन और सहकार के जीवन रस को चूसकर समाज रूपी अक्षयवट को ही सुखा डालती है।

भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता दोनों ही मारक है। अंतिम परिणाम भी दोनों का एक ही है। फिर भी हमें दोनों में से एक का चुनाव करने को बाध्य किया जा रहा है , राजनैतिक सत्ता के द्वारा और वह भी हमारे ही नाम पर यानि आम जनता के नाम पर।

हमारे विवेक के  सामने एक गंभीर चुनौती है। सदाचारी (?) साम्प्रदायिकता  और भ्रष्टाचारी धर्मनिरपेक्षता (?) के अलग अलग मकड़ जाल में हम गहरे उलझ जाएँ इस से पहले इन्हे विच्छिन्न करना अति आवश्यक है।

करुणेश
पटना
२९ ०७। २०१७ 

Saturday, 22 July 2017

आदरणीय बाबूजी

आदरणीय बाबूजी

सादर चरण स्पर्श

हम लोग यहाँ कुशल से हैं। और यही आपकी कुशलता भी है क्योंकि आपकी मान्यता भी ऐसी ही रही है। आपके सारे नाती - पोते भी सकुशल हैं और अपनी - अपनी जगह प्रगति के पथ पर हैं।

बाबूजी आपको चिट्ठी लिखने के दो कारण हैं। पहला यह कि कल आप की पुण्य तिथि है और दूसरा यह कि मन कर रहा था यूँ ही। वैसे भी आपको चिट्ठी लिखने के लिए किसी कारण के होने की जरूरत ही नहीं। थोड़ा अल्लड़ - बल्लड़ तो होगा ही। फिर भी।

हमें याद आता है गरहनी में सुबह - सुबह आपका हनुमान जी को याद करना और उन्हें हनुमान भैया कह कर सम्बोधित करना। बड़का बाबूजी के निधन के बाद आपका हनुमान जी से बना यह रिश्ता अब हममें कौतुहल भी पैदा करता है और प्रेरणा का कारण भी बनता है।

हमें छोटकी फुआ को उनकी जिंदगी भर तीज भेजना भी याद है। बगैर कुछ कहे आप सीखा गए परम्पराओं को निभाना और छोटों को प्यार करना। सच यूँ ही नहीं परम्पराएं सदियों तक निभाने के लिए होती हैं।

हमें यह भी याद आता है बेशक प्यार अपनी संतान से करना मगर प्रशंसा उन सबकी करना जिनके कार्य और उपलब्धियां प्रशंसनीय हों। हमने सीखा है आपसे विस्तार - आकाश की तरह। अच्छा है आप स्वयं आकाश हो गए। हमें उड़ने के लिए किसी दूसरे आकाश का मोहताज़ नहीं होना पड़ा।

हमने देखा है आपका बच्चा हो जाना। गरहनी में बनास नदी किनारे रहने वाले गोपाल मिश्रा की माँ के हाथों का ओंठगन जिउतिया के बाद खाना। वह भी उनकी पूरी जिंदगी तक। बाबूजी, माँ खोज लेने का  यह कौशल  हम आपसे नहीं सीख पाए इसका अफ़सोस होता है। 

हमने देखा है आपका अटल पर्वत हो जाना। १९७५  की इमरजेंसी के दिनों में घर आयी पुलिस घेरेबंदी से अपने बेटे को साहस पूर्वक गिरफ़्तारी से  बचा लेना। इतना ही नहीं आपकी स्व लिखित जीवनी में उद्धरित कई घटनाओं का आपके द्वारा सामाजिक सरोकारों के लिए दृढ़ता पूर्वक खड़े होने का सहज बयाँ हो जाना।

 धार्मिक या जातीय हुए बगैर गरहनी की जगिया , जिनती और मनकिया को बेटी का सम्बोधन दे देना। इतना ही नहीं गरजन को भी बेटा  बना लेना। आज तक इनके लिए हमारे सम्बोधन दीदी और भैया ही हैं। चाहे राज़ मिस्त्री का काम करने वाले अब्दुल हई रहे जिन्हे हम हैया भैया कहते रहे या फिर मोहन मज़दूर जो हमारे लिए मोहन भैया थे जो काम के बाद हमें मुंह से तुड़तुड़ी की आवाज़ सुनाते  थे। सहदेव का गोइठा आजीवन हमारे घर ही आना बाबूजी भला आपके बगैर कैसे होता। सच आप में कितने लोग थे हमारे साथ।

धोती , कुरता और जवाहर जैकेट पहन कर शाम में ओटा पर बैठते बाबूजी और उनके साथ बैठे हुए लोग जिनके लिए चाय बनाने की मांग का  ड्योढ़ी से होते हुए अंगना तक पहुंचने के पहले ही बढ़ते जाना।माई का यह कहते हुए झल्लाना कि  पता नहीं अब कौन इनका बेटा आ गया। चाय की हर प्याली के बाद पहले सिगरेट और फिर पान। सुबह के पनबट्टे की याद भी है जिसे बड़ी बहनें निभाती रही।

धर्मयुग , साप्ताहिक हिन्दुस्तान , दिनमान आदि पत्रिकाओं से हमारा परिचय अनायास ही हो गया था। आखिर घर में एक कमरा जो था जिसे पुस्तकालय ही तो कहते थे। अनगिनत पुस्तकों को संजो कर आपने हमें दिया था। हमी उसे संभाल नहीं पाए पूरी तरह। आपने इस पुस्तकालय का एक नाम भी दिया था - नंदन पुस्तक सदन। शायद इस नाम के जिल्द वाली कुछ पुस्तकें अब भी हों।

अपनी कविताओं के नीचे देवनागरी में आपका हस्ताक्षर आज भी हमें श्रेष्ठतम हस्ताक्षर लगता है यद्यपि अपने डॉक्टर प्रिस्क्रिप्शन पर आपके हस्ताक्षर सदैव रोमन लिपि में ही रहे। भाषा का ऐस गरिमा पूर्ण सम्मान कम देखने को मिलता है।

और बाबूजी आपको हमने देखा एक सामान्य पिता की तरह जिंदगी से जूझते हुए। बेटे बेटियों से उलाहना सुनते हुए। और फिर इन्हे ही अल्लड़ - बल्लड़ कहते हुए। नए कल की आशा में। इतना तो सीख ही लिया बाबूजी कि असली जिंदगी तो अल्लड - बल्लड़ से होते हुए ही गुजरती है लेकिन हर दिन उसे छोड़ते हुए एक नए कल की आशा के साथ।

बाबूजी सबसे छोटा  बच्चा बन  कर आपके साथ आपकी थाली से आपके हाथों से एक बार खाना चाहता हूँ। हाँ आप ठीक कहते हैं - पहले मैं बच्चा तो बनूँ। एक दिन मैं जरूर बच्चा बनूँगा और हाँ तब आपके आसमान की गोद में धमाचौकड़ी जरूर होगी चाहे इसके लिए आप कितना भी गुस्सा क्यों न हों। 

आपके सारे दुलारे 

हम सभी 

आज की कविता ; आज के लिए

न्याय मरे न्यायधीश मरे न्यायालय लेकिन मौन । इतने सर हैं , इतने बाजू देखो लेकिन बोले, कितने - कौन ? सत्ता की कुंडी खड़काने आये जो दो -...