Saturday, 26 August 2017

भारतीयों को शर्म नहीं आती

यह देश बेशर्म नागरिकों का देश है। ऐसा कहने में मुझे कोई संकोच नहीं हो रहा। और हो भी क्यों ?

जिस देश में साठ से अधिक शिशु वहां मरते हैं जहाँ उन्हें जिंदगी देने की व्यवस्था की गयी है। पूरी राज्य व्यवस्था मौतों पर मात्र फूहड़ नौटंकी करती है चंद घंटों के लिए नहीं बल्कि दिनों तक। स्वाधीनता दिवस के अवसर पर  राष्ट्र को सम्बोधित करता प्रधानमंत्री एक लफ्ज भी शिशुओं की मौत पर नहीं बोलता। और हम भारतीय जय - जय में लगे हैं। किसी को यह नहीं सूझा  कि झंडोतोलन और राष्ट्रगीत के बाद दो मिनट का मौन ही रख ले उन शिशुओं की मौतों पर। आंसू बहाने का जिम्मा उन शिशुओं के माँ बाप तो उठाएंगे ही। हम भारत के लोग भला ऐसा क्यों करें ? हमें शर्म नहीं आती। 

सप्ताह दस दिनों के अंदर दो रेल दुर्घटनाएं होती हैं। शायद हम सोचते हैं ऐसा तो होता ही रहता है। फ़िल्मी भाषा में कहें तो " बड़े बड़े देशों में छोटी छोटी बाते होती ही रहती हैं। क्या फर्क पड़ता है। और शर्मिंदा होना वह भी ऐसी छोटी बात के लिए भला समझदारी है क्या ? प्रभु जी ने तो त्याग पत्र सौप ही दिया है। महाप्रभु की स्वीकृति का इंतजार है। और क्या कर सकते हैं बेचारे। हम क्यों शर्मिंदा हों हमारी थोड़े ही गलती है। एक दम सही। होना भी नहीं चाहिए। होना भी यही चाहिए। हमने त्यागपत्र को शर्म पत्र मान लिया है। 

एक सांस में तीन तलाक को सर्वोच्च न्यायालय ने अवैध घोषित कर दिया। यह हिंदुत्व की जीत है। यह सरकार की जीत है। यह संघ की जीत है। इसके बाद भी जीत की मात्रा बची हो तो उन महिलाओं के दे दें जिन्होंने यह संघर्ष किया। लेकिन क्या मात्र जीत की भावनाओं के साथ जीवन जिया जा सकता है। हमें क्या ? हमने तो इस फैसले के पक्ष में सोशल मीडिया पर लाइक , ट्वीट और रीट्वीट कर ही दिया है। २०१९ के प्रजातान्त्रिक महापर्व में स्थान और समय के अनुरूप इसका कौशल के साथ उपयोग राजनीति कर ही लेगी। और हम इस या उस खेमे में होंगे अपना वोट देते हुए। एक नागरिक का वोट राजनितिक दलों की करनी का समर्थन नहीं होता। फिर भी ऐसा ही होगा। हमने आर्ष वचनों , परम्पराओं और प्रतीकों को अतार्किकता की हद तक बचाये रखने , निभाने और आगे बढ़ाने का संकल्प जो उठा रखा है। चाहे ऐसा करने में संविधान की धज्जियाँ क्यों न हो जाए। कितने भारतीयों को यह पता है कि भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक से वैज्ञानिक सोच को अपनाने और प्रचार - प्रसार करने की अपेक्षा रखता है। लेकिन संविधान की उपेक्षा शर्मिंदा होने का कोई कारण तो नहीं। 


बलात्कार , हत्या और यौन हिंसा के दोषी को  बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह कहा जाता है। कोई उसे बलात्कारी और हत्यारा कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा। पूरी मीडिया बिरादरी पत्रकार स्वर्गीय छत्रपति के गुण गान करते नहीं थक रही लेकिन वैसा होने का साहस इक्का दुक्का ही कर पाते हैं। राजनीति ने मौन धारण कर रखा है। एक शहर जला। न्यायलय चीखती चिल्लाती रही। व्यवस्था का शिखंडी स्वभाव दर्शनीय रहा। अगली सुबह पचकुला के शहरवासी मॉर्निंग वाक पर भी निकले। शमसान में अर्ध रात्रि का सन्नाटा भी इतना भयावह शायद ही हो। पर सबने सोचा चलो अभी के लिए बला टली। अब २८ अगस्त को देखते हैं क्या होता है। हम मान चुके हैं कि ऐसा ही होगा। सामूहिक बेशर्मी का ऐस उदाहरण भला कहाँ मिलेगा। 

 भारतीय राजनीति का प्रतिपक्ष साझी विरासत बचाने की बात कर रहा है। और वह भी ऊंघते हुए अनमने ढंग से। क्या गलत है इसमें। ऊंघते अनमने नागरिकों वाले भारत को चाहिए भी यही। एक सौ तीस करोड़ की आबादी वाले देश को शायद सब कुछ मिल जाए पर मिलेगा शर्म खोकर ही। 

इसलिए भारतीयों को शर्म नहीं आती। जरूर दो चार लाख लोग इस श्रेणी में नहीं आते लेकिन बेशर्मी के इस महासागर में दो चार लाख मीठी बूंदें क्या कर लेंगी सिवाय कुछ लोगों में उत्साह भरने और बाकियों में आशा जगाने के। 

करुणेश 
पटना 
२६। ०८। २०१७ 





Saturday, 29 July 2017

बदलाव

बिहार में सत्रह घण्टों के अंदर सत्ता बदल गयी। नहीं , सच ये है कि सत्ता के चेहरे बदल गए। कारण और परिस्थितियां सर्व ज्ञात हैं और परिणाम भी। 

चेहरों के इस बदलाव को मैं एक आईने की तरह देखता हूँ। इस आईने में भारतीय राजनीति का जो चित्र उभर रहा है वह बहु आयामी न होकर द्वी ध्रुवीय दिख रहा है जिसके एक सिरे पर साम्प्रदायिकता है तो दूसरे सिरे पर भ्रष्टाचार। भारतीय राजनीतिज्ञों को जनता को देने के लिए यही दो चीज़ें हैं। जनता की मजबूरी है कि इनमे से ही कोई एक चुने। यह और ज्यादा तकलीफदेह है कि जन संवाद , बौद्धिक संवाद और पत्रकारीय संवाद - ये तीनों भी द्वी ध्रुवीय हो गए हैं और इसीलिए संवादों में गरिमा , गांभीर्य और विवेक का ह्राष उत्तरोत्तर  दिख रहा है। 

भ्रष्टाचार का अर्थ मात्र आर्थिक भ्रष्टाचार नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि आर्थिक भ्रष्टाचार के कारण ही सामाजिक विषमता और विद्वेष पैदा होते हैं। सामान्यतः सारे जन असंतोष के मूल में आर्थिक भ्रष्टाचार ही होता है। सत्ता व्यक्तिगत आर्थिक भ्रष्टाचार का शमन , दमन या प्रोत्साहन मात्र ही कर सकती है। किन्तु भ्रष्टाचार जब विचार का रूप लेकर संस्था बन जाए तो जनता भ्रमित हो जाती है। हम भ्रम की ऐसी ही परिस्थितियों के साक्षी बन रहे हैं। पढ़ने , देखने और सुनने में ये विचार बड़े सम्मोहक लगते हैं और इनके सम्मोहन का जब तक एक्सपायरी डेट आता है तब तक हम इसके शिकार हो चुके होते हैं। 

सम्प्रदायिकता कोई सोच नहीं बल्कि एक व्यव्हार है। लेकिन व्यहार का अर्थ स्वाभाविक मानवीय व्यवहार नहीं। मेरी समझ में यह एक प्रतिक्रियात्मक व्यव्हार (Reactionary Behaviour) है। सामान्यतः मनुष्य दो स्तरों  पर  जीता है - पहला शरीर के स्तर पर और दूसरा विश्वास के स्तर पर। मनुष्य के विश्वास का जब उग्र एवं अपमानजनक खंडन होने लगे या अतार्किक अति महिमांडन होने लगे तो तो सम्प्रदियकता की विष - बेल  उगती है। यह विष बेल परजीवी पौधे की तरह सामाजिक संरचना के तने के  चारों ओर लिपट जाती हैं और तने  से होकर टहनियों और पत्तों में जाने वाले सहजीवन और सहकार के जीवन रस को चूसकर समाज रूपी अक्षयवट को ही सुखा डालती है।

भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता दोनों ही मारक है। अंतिम परिणाम भी दोनों का एक ही है। फिर भी हमें दोनों में से एक का चुनाव करने को बाध्य किया जा रहा है , राजनैतिक सत्ता के द्वारा और वह भी हमारे ही नाम पर यानि आम जनता के नाम पर।

हमारे विवेक के  सामने एक गंभीर चुनौती है। सदाचारी (?) साम्प्रदायिकता  और भ्रष्टाचारी धर्मनिरपेक्षता (?) के अलग अलग मकड़ जाल में हम गहरे उलझ जाएँ इस से पहले इन्हे विच्छिन्न करना अति आवश्यक है।

करुणेश
पटना
२९ ०७। २०१७ 

Saturday, 22 July 2017

आदरणीय बाबूजी

आदरणीय बाबूजी

सादर चरण स्पर्श

हम लोग यहाँ कुशल से हैं। और यही आपकी कुशलता भी है क्योंकि आपकी मान्यता भी ऐसी ही रही है। आपके सारे नाती - पोते भी सकुशल हैं और अपनी - अपनी जगह प्रगति के पथ पर हैं।

बाबूजी आपको चिट्ठी लिखने के दो कारण हैं। पहला यह कि कल आप की पुण्य तिथि है और दूसरा यह कि मन कर रहा था यूँ ही। वैसे भी आपको चिट्ठी लिखने के लिए किसी कारण के होने की जरूरत ही नहीं। थोड़ा अल्लड़ - बल्लड़ तो होगा ही। फिर भी।

हमें याद आता है गरहनी में सुबह - सुबह आपका हनुमान जी को याद करना और उन्हें हनुमान भैया कह कर सम्बोधित करना। बड़का बाबूजी के निधन के बाद आपका हनुमान जी से बना यह रिश्ता अब हममें कौतुहल भी पैदा करता है और प्रेरणा का कारण भी बनता है।

हमें छोटकी फुआ को उनकी जिंदगी भर तीज भेजना भी याद है। बगैर कुछ कहे आप सीखा गए परम्पराओं को निभाना और छोटों को प्यार करना। सच यूँ ही नहीं परम्पराएं सदियों तक निभाने के लिए होती हैं।

हमें यह भी याद आता है बेशक प्यार अपनी संतान से करना मगर प्रशंसा उन सबकी करना जिनके कार्य और उपलब्धियां प्रशंसनीय हों। हमने सीखा है आपसे विस्तार - आकाश की तरह। अच्छा है आप स्वयं आकाश हो गए। हमें उड़ने के लिए किसी दूसरे आकाश का मोहताज़ नहीं होना पड़ा।

हमने देखा है आपका बच्चा हो जाना। गरहनी में बनास नदी किनारे रहने वाले गोपाल मिश्रा की माँ के हाथों का ओंठगन जिउतिया के बाद खाना। वह भी उनकी पूरी जिंदगी तक। बाबूजी, माँ खोज लेने का  यह कौशल  हम आपसे नहीं सीख पाए इसका अफ़सोस होता है। 

हमने देखा है आपका अटल पर्वत हो जाना। १९७५  की इमरजेंसी के दिनों में घर आयी पुलिस घेरेबंदी से अपने बेटे को साहस पूर्वक गिरफ़्तारी से  बचा लेना। इतना ही नहीं आपकी स्व लिखित जीवनी में उद्धरित कई घटनाओं का आपके द्वारा सामाजिक सरोकारों के लिए दृढ़ता पूर्वक खड़े होने का सहज बयाँ हो जाना।

 धार्मिक या जातीय हुए बगैर गरहनी की जगिया , जिनती और मनकिया को बेटी का सम्बोधन दे देना। इतना ही नहीं गरजन को भी बेटा  बना लेना। आज तक इनके लिए हमारे सम्बोधन दीदी और भैया ही हैं। चाहे राज़ मिस्त्री का काम करने वाले अब्दुल हई रहे जिन्हे हम हैया भैया कहते रहे या फिर मोहन मज़दूर जो हमारे लिए मोहन भैया थे जो काम के बाद हमें मुंह से तुड़तुड़ी की आवाज़ सुनाते  थे। सहदेव का गोइठा आजीवन हमारे घर ही आना बाबूजी भला आपके बगैर कैसे होता। सच आप में कितने लोग थे हमारे साथ।

धोती , कुरता और जवाहर जैकेट पहन कर शाम में ओटा पर बैठते बाबूजी और उनके साथ बैठे हुए लोग जिनके लिए चाय बनाने की मांग का  ड्योढ़ी से होते हुए अंगना तक पहुंचने के पहले ही बढ़ते जाना।माई का यह कहते हुए झल्लाना कि  पता नहीं अब कौन इनका बेटा आ गया। चाय की हर प्याली के बाद पहले सिगरेट और फिर पान। सुबह के पनबट्टे की याद भी है जिसे बड़ी बहनें निभाती रही।

धर्मयुग , साप्ताहिक हिन्दुस्तान , दिनमान आदि पत्रिकाओं से हमारा परिचय अनायास ही हो गया था। आखिर घर में एक कमरा जो था जिसे पुस्तकालय ही तो कहते थे। अनगिनत पुस्तकों को संजो कर आपने हमें दिया था। हमी उसे संभाल नहीं पाए पूरी तरह। आपने इस पुस्तकालय का एक नाम भी दिया था - नंदन पुस्तक सदन। शायद इस नाम के जिल्द वाली कुछ पुस्तकें अब भी हों।

अपनी कविताओं के नीचे देवनागरी में आपका हस्ताक्षर आज भी हमें श्रेष्ठतम हस्ताक्षर लगता है यद्यपि अपने डॉक्टर प्रिस्क्रिप्शन पर आपके हस्ताक्षर सदैव रोमन लिपि में ही रहे। भाषा का ऐस गरिमा पूर्ण सम्मान कम देखने को मिलता है।

और बाबूजी आपको हमने देखा एक सामान्य पिता की तरह जिंदगी से जूझते हुए। बेटे बेटियों से उलाहना सुनते हुए। और फिर इन्हे ही अल्लड़ - बल्लड़ कहते हुए। नए कल की आशा में। इतना तो सीख ही लिया बाबूजी कि असली जिंदगी तो अल्लड - बल्लड़ से होते हुए ही गुजरती है लेकिन हर दिन उसे छोड़ते हुए एक नए कल की आशा के साथ।

बाबूजी सबसे छोटा  बच्चा बन  कर आपके साथ आपकी थाली से आपके हाथों से एक बार खाना चाहता हूँ। हाँ आप ठीक कहते हैं - पहले मैं बच्चा तो बनूँ। एक दिन मैं जरूर बच्चा बनूँगा और हाँ तब आपके आसमान की गोद में धमाचौकड़ी जरूर होगी चाहे इसके लिए आप कितना भी गुस्सा क्यों न हों। 

आपके सारे दुलारे 

हम सभी 

Thursday, 20 July 2017

स्लैप (SLAP)

अंग्रेजी के शब्द स्लैप का शाब्दिक अर्थ होता है चाँटा , तमाचा या थप्पड़। सामान्यतः इसका प्रयोग घरों में बच्चों पर बड़ों के द्वारा किया जाता है - पारिवारिक दंड विधान के तौर पर। पहले स्कूलों में तो यह सर्वमान्य अधिकार हुआ करता था मास्टर साहब , गुरु जी या माट साब का और इसका विरोध भी नहीं होता था। न तो माता पिता द्वारा और न ही गांव घर के बड़े बुज़ुर्गों द्वारा। कहावत ही थी - " सिखाते गुरु जी नहीं , सिखाती छड़ी है।" थप्पड़ , चाँटा या तमाचा खाने वाला भी इसे प्रसाद स्वरुप ही ग्रहण करता था बिना किसी मनो मालिन्य के। 

थप्पड़ के अभिनव प्रयोग भारतीय सिनेमा में भी बहुलता से प्रदर्शित किये गए हैं। अमरीश पुरी  अभिनीत डॉक्टर डेंग के किरदार का मशहूर डायलाग अक्सर कानों में गूंजता है - " इस थप्पड़ की गूँज बहुत दूर  तक सुनाई देगी।" खलनायकों के चेहरे पर नायिकाओं और नायक की बहनों के तमाचे एक समय में हिंदी सिनेमा के अभिन्न अंग होते थे। 

कुछ तमाचे बेआवाज होते हैं। लेकिन इनकी भयावहता भीषण होती है। गाँव में चार पांच दशक पहले तीन घटनाएं निश्चित अभिशाप मानी जाती थी। पहला लगातार बेटी का पैदा होना , दूसरा किसी को घर मकान बनाने के लिए धूर्तता पूर्ण तरीके से प्रेरित करना और तीसरा किसी का केस - मुक़दमे में फँस जाना या फँसा  देना। इनमे पहला दैवीय अभिशाप था। दूसरा गँवई राजनीति का नमूना और तीसरा सताने और बदला लेने का तरीका। 

पहले दो अभिशाप अब लुप्तप्राय से हो गए हैं। लेकिन तीसरे का प्रयोग अधिकार संपन्न प्रभु वर्ग पूरी स्वच्छंदता से करता हुआ दीखता है। विशेषकर मानहानि के सन्दर्भ में और मीडिया के ऊपर। 

"द वायर - हिंदी" पर आज ही एक लेख पढ़ा।  इकनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली के संपादक प्रंजॉय गुहा ठाकुरता ने इस पत्रिका के सम्पादक पद से त्यागपत्र दे दिया है और अपने परिवार के साथ समय बिताने की इच्छा प्रगट की है। जैसा कि इस लेख को पढ़ने से ज्ञात होता है कि कुछ दिन पहले ठाकुरता और उनके तीन साथी लेखकों  द्वारा अडानी पावर लिमिटेड के द्वारा एक हज़ार  करोड़ रुपये की कर चोरी और बीजेपी सरकार द्वारा अडानी समूह को पांच सौ करोड़ रुपये का लाभ पहुंचने का स्पष्ट इशारा करते हुए एक विस्तृत लेख लिखा था। इस लेख की प्रतिक्रिया स्वरुप उन्हें अडानी ग्रुप के वकीलों द्वारा कानूनी नोटिस भेज दिया गया। इतना ही नहीं पत्रिका के संचालक ट्रस्ट बोर्ड ने पत्रिका के सम्पादकीय विभाग को यह लेख हटाने के लिए भी कहा है  जिसके बाद का घटना क्रम ठाकुरता का त्यागपत्र है। उक्त लेख के सहयोगी लेखक हैं - प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर , राजनीति वैज्ञानिक राजिव भार्गव , और समाज शास्त्री दीपांकर गुप्ता। 

यह लेख पढ़ने के बाद मेरे मन में यह विचार आया कि किसी लेख का विरोध या प्रतिरोध वकीलों द्वारा भेजा गया कानूनी नोटिस कैसे हो सकता है। क्या अडानी समूह ने पत्रिका को नोटिस देने के पूर्व अपनी सफाई भेजी थी। अडानी की मान हानि हुई या मान लाभ में कमी। 

सत्ता और वित्त के दंभ और अभिमान में किये जा रहे ऐसे प्रयासों का बड़ा सटीक नाम दिया है न्यूयोर्क टाइम्स ने "स्लैप - स्ट्रेटेजिक लासुईट्स अगेंस्ट पब्लिक पार्टिसिपेशन।" एक चांटा जो बेआवाज हो और उसकी धमक उतनी जो सोचने वाले दिमागों को सुन्न कर दे। धारणा का खेल खेलने वाले तथ्यों और तर्कों की बात क्यों करें।  यह भी उनके सम्मान के खिलाफ ही है। 

आज एक लेख कल एक पत्रिका परसों अखबार और फिर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया। देश बदल रहा है। 

करुणेश 
पटना 
२०। ०७। २०१७ 


Thursday, 13 July 2017

पिछले दिनों


पिछले काफी दिनों से कुछ लिख नहीं पाया। ऐसा नहीं कि लिखने के लिए विषयों की कमी थी। किसानों की समस्या। उनकी आत्महत्याएं। मध्य प्रदेश के मंदसौर में किसानों के प्रदर्शन का प्रशासनिक दमन। बिहार की ढहती - चरमराती शिक्षा व्यस्था के नमूने के तौर पर आया इस वर्ष का मैट्रिक रिजल्ट। मैंने सोचा लिखने से पहले कुछ पढ़ा जाए इन विषयों पर। किसानों की समस्या पर स्वामीनाथन आयोग का नाम भर सुना था। नेट पर इसका सारांश पढ़ा। थोड़ा समझा। किसानों और किसानी से सम्बंधित लेख - आलेख भी नेट पर पढ़े। पर जो पढ़ सका उस से इतर और कुछ सोच नहीं पाया। यह भी मान लिया कि इस विषय पर मैं कुछ लिखने की कोशिश करूँ  इस से बेहतर है कि कुछ और पढूं , कुछ और सुनूं। इसी तरह बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर मुचकुन्द दुबे जी की अध्यक्षता वाली कॉमन स्कूल सिस्टम पर लिखी २६८ पन्नों की रपट भी पढ़ी। यह तो नहीं कह सकता कि पूरी पढ़ डाली लेकिन अधिकाँश भाग जरूर पढ़ा। अभी मेरा छोटा सा दिमाग स्वामीनाथन और मुचकुन्द दुबे की रपटों को करीने से सजा भी नहीं पाया था कि जफ़र और जुनैद की भीड़ द्वारा की गयी हत्या की खबरें मेरे चारों ओर चक्कर काटने लगीं। संवेदना के समय समाप्ति की सूचना भारत की आर्थिक आज़ादी (जी एस टी ) के उद्घोष की शंख ध्वनि में मद्धम होते - होते शून्य  में विलीन हो गयी। 

शायद इतना ही काफी न था। राष्ट्रपति के होने वाले  चुनाव के लिए राजनितिक दाँव - पेंच का अद्भुत दृश्य भी आँखों से गुजरा। दलितों का इस से ज्यादा और दलन क्या हो सकता है। यह ठीक वैसे ही है जैसे औरतों पर अत्याचार करने से पहले समाज उसे देवी मान लेता है।

इतनी बातों के बीच में गोरक्षा का मुद्दा तो मैं भूल ही गया। और हाँ स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री का इजराइल दौरा भी। इजराइल ने तो एक होलोकास्ट म्यूजियम बनाया है - जर्मन लोगों द्वारा यहूदियों पर की गयी बर्बरता की याद में। यहाँ भारत में तो घर ही बदल जा रहे हैं होलोकास्ट म्यूजियम के रूप में। इन्हें देखने नेता भी आते हैं। लेकिन चूँकि भारत में हर रोज कहीं न कहीं एक होलोकास्ट म्यूजियम बन रहा है (कहीं - कहीं तो पूरा मोहल्ला या पूरा गांव ) अतः नेताओं का दौरा मात्र नवीनतम म्यूजियम का ही होता है। पुराने को समाज भी भूल जाता है और नेता भी। काश ! गोएबेल्स को आज भारत में होना चाहिए था। जिस काम में आज फेसबुक और व्हाट्सप्प के बावजूद महीनों लग जा रहे हैं वह दिनों तो क्या घंटों में कर देता। सच जब तक समझ में आएगा तब तक हिटलर और गोएबेल्स अपना काम कर चुके होंगे अपने न होने के बावजूद। फिर क्या लिखना क्या कहना क्या सुनना और क्या पढ़ना। 

पश्चिम बंगाल में इन दिनों धर्म खतरे में हैं। राज धर्म और  मानव धर्म दोनों सकते में हैं। पता नहीं कौन सा धर्म खतरे में है।अब तो इसमें वैशिवकता का पुट भी शामिल हो गया है। धर्म की आधार भूमि पर सत्ता - संघर्ष और वर्ग - संघर्ष का हिंसक रूप पूरी पैशाचिकता के साथ नृत्य करता हुआ दिख रहा है।

अमरनाथ के तीर्थ यात्रियों पर आतंकवादी हमला भी हो चुका है और प्रशासनिक  चूक की बात स्पस्ट है। मगर कश्मीर घाटी की हर समस्या तो पाकिस्तान जनित है। इसलिए पाकिस्तान को गालियां बक कर हमने राष्ट्र जीवन को आगे बढ़ाने का पुनीत कार्य भी प्रारम्भ कर दिया है। घटना की भर्त्सना और कड़ी निंदा की परम्परा का भी भरपूर पालन हुआ है।

देश को इन घटनाओं के बाद सुविधाजनक ऐतिहासिक अंश बताये गए। भारतीय इतिहास की भयंकर भूलों के परिमार्जन के उन्मादी विकल्प आम लोगों को उपलब्ध कराये गए। अगली भीड़ बनाने की तैयारी पूरी हो गयी है विशेषज्ञों के द्वारा। हमारे पास दो ही विकल्प है - चाहे इस ओर या उस ओर। चाहे हम किसी भी ओर हों हमारी नियति भीड़ होना है। और भीड़ की नियति राजनीति के समुद्र में मिल जाना। हम में से हरेक निर्मल जल की एक मीठी बूँद है और साथ बहना हमारा स्वाभाव मगर राजनीति के समुद्र में मिलते ही हम में से हरेक खारे  पानी की बूँद बन जाने को अभिशप्त हो रहे हैं।

कोई तो बचाये।

करुणेश
पटना
१३। ०७। २०१७ 

Tuesday, 6 June 2017

Tasting Time,Testing Time,Interesting Time

In December 2016 , I came across a news on my TV set - "NDTV was to go off air for 24 hours". It did not happen as the 24 hour off air ban imposed by the government was not effected. The reason for this ban was said to be showing pictures of sensitive areas of Pathankot Airforce base during a debate show which was as per the government a possible security threat/leakage. It appeared in the post reports that government took a generous stand and considered the clarifications of NDTV and lifted the ban.

A few days ago a ruling party spokesperson on a live debate show accused NDTV of running an Agenda which was refuted strongly by the Anchor Ms. Nidhi Razdan and asked him to take back the words and apologise. The ruling party spokesperson refused and sounded disrupting the debate. The anchor made him off air. (As mentioned in various media reports available on web)

on 5th June 2017 NDTV co - chairperson and founder Mr. Pranay Roy's residence and other places were raided by CBI on an allegation of denting a loss of Rs. 48 Crores to ICICI Bank. NDTV showed its clarifications regarding the issue and also added in its public statement that such acts of establishment shall not make them cow down to their ethics and principles to which they stand for. Thre was a clarification from one Union Cabinet Minister denying the act of raid as intentional.

A good section of social, political and media activists criticised and condemned the CBI raid on NDTV founder and co - chairperson. As usual there were abundant support for the CBI raid in favour of the act in all possible languages(!). 

One article published on web caught my attention specifically.It said that a media house is nothing more than a "News Trader" as such it need to be viewed as routine activity of CBI as CBI and other government agencies conduct raids on any other trader viz - jewellary house , a grocery trader or any other of that structure.

For me as a conscoius viewer and reader therefore it is tasting time. The "Trader Logic" gives me the reason to say that a medical doctor is a medical trader, a lawyer is a law trader, a teacher is a education trader,a soldier is a security trader,and a politician is a power trader and so on and so forth. Within no minute the trader logic passed through my eyes it started hammering my intelect. Such Chhole - Chaat comments are really tasteworthy! Oh my God , it really brought tears in my eyes due  to its hot red chilliness and tamarind sour flavour. So friends taste it till you bear it!

Testing Time. Yes it is. It is a testing time for the reason that whether you will prefer a borrowed voice or not. It is a testing time for the reason whether you will believe what is showed or told or what you see and tell. It is a testing time for the reason whether what you want to be or what you are made to be. It is a testing time for the reason whether dissent deserves space or not. It is a testing time for the reason whether it is important good to be god or god to be good. It is testing time for the reason whether civilian killing is just or not. And it is testing time also for the reason whether important is an ask or a stoic mask. We are committed to test the test. 

It is indeed an interesting time to me. The prevailing ambience is reinventing me everyday. Thank you all participant. I am hopeful I shall reinvent myself sooner than later. Yes I will. I have to.

Tonguing the taste and testing the test shall bring to me interesting time. What about you?

Karunesh

Patna

06/06/2017

Tuesday, 30 May 2017

शिक्षा और रोजगार

सामान्यतः शिक्षा और रोजगार का अन्योनाश्रय सम्बन्ध माना जाता है। यह भी सर्वमान्य है कि शिक्षा व्यक्ति को रोजगार दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। रोजगार का सीधा सम्बन्ध उत्पादन से है। रोजगार का सम्बन्ध समाज में व्यक्ति की उपयोगिता और मूल्यवत्ता से भी है। अर्थात शिक्षा व्यक्ति को समाज में आर्थिक रूप से उपयोगी और मूल्यवान बनाती है - ऐसा कहा जा सकता है। 

सामन्यतः जब हम शिक्षा की बात करते हैं तो इसका अर्थ अकादमिक शिक्षा से ही लिया जाता है। जीवन के प्रारंभिक वर्षों से ही अकादमिक शिक्षा की शुरुआत हो जाती है जो कम से कम १५ - १७ वर्षों तक तो सामान्यतः चलती ही है। लेकिन इतने वर्षों की शिक्षा हमें आर्थिक रूप से समाज में उपयोगी नहीं बना पाती। तभी तो " कौशल विकास " जैसी योजना की जरूरत महसूस हुई। यह दुर्भाग्य और दुर्घटना दोनों ही है कि आजादी के बाद की लगभग दो पीढ़ियां इसका शिकार हुईं। इसलिए शिक्षा की दुरवस्था और घटते रोजगार के मौके की पहचान यदि राष्ट्रीय आपदा के रूप में नहीं की जा रही है तो यह देश के लिए किसी भी बड़े खतरे से बड़ा खतरा होगा जिसके परिणाम कल्पनातीत होंगे। 

अंग्रेजी में एक कहावत है "Rising tide raises all boats" जिसका हिंदी रूपांतरण होगा समुद्र में ज्वार आने पर लहरें सभी जलयानों का स्तर उठा देती हैं। इसका निहितार्थ यह भी कि ऐसा होने का कारण जलयानों की अतिरिक्त योग्यता या नाविकों की कार्यक्षमता  न होकर समुद्र में उठने वाला ज्वार है। इस उद्धरण को यहां कहने का तात्पर्य यह भी है हमें तकनीक सम्पन्नता को मानवीय विकास की सम्पूर्णता मानने की भूल नहीं करनी चाहिए। इसे सिद्ध करने के लिए जटिल आंकड़ों की दुनिया में न जाकर सिर्फ यह देखने से ही पर्याप्त प्रमाण मिल जाएगा कि एकाधिक बार मौलिक आवश्यकताओं  पर किया जाने वाला व्यय सुविधा के लिए किये गए तकनिकी आवश्यकताओं के मुकाबले काफी कम होता है। राजनीति इसे ही विकास का पैमाना मानती है और अपनी उपलब्धि भी। इस विकास के दिवास्वप्न से हम सब अनेकों बार छले जाते है लेकिन यह इतना आकर्षक और सम्मोहक होता है कि इसकी कुटिलता हमें दिखाई नहीं देती। यही कारण है कि शिक्षा और रोजगार जैसे गंभीर विषय जो सदियों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं या तो आंकड़ों में खो जाते हैं या अरण्य रोदन बन कर रह जाते हैं। 

औद्योगिक क्रांति के बाद वैश्विक तकनीक सम्पन्नता से पूरे विश्व में एक तकनिकी ज्वार आया है। परमाणु विज्ञानं और सूचना एवं संचार क्रांति ने इस ज्वार को अति गतिशीलता दी है और बहु आयामी भी बनाया है। इस युग ने जो सबसे बड़ी चुनौती हमारे सामने रखी है वह है बदलाव की गति (Speed of Change). गति का परिमाण आज तीव्रतम है और इसके और अधिक तीव्रतर होने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

अब फिर से मूल प्रश्न पर लौटते हैं। हमने यह मान लिया कि आज की शिक्षा कौशल विकास नहीं करती। और इसीलिए यह रोजगार परक भी नहीं। साथ - साथ हमें यह भी जानना और मानना होगा कि यह शिक्षा बदलाव की गति से अपना साम्य स्थापित करने में पूरी तरह विफल है। कोई आश्चर्य नहीं कि देश का सेंसेक्स एवं जी डी पी और बेरोजगारी दोनों साथ - साथ नयी ऊचाइंयों को छू रहे हैं।

कौशल विकास के द्वारा हम रोजगार परकता यानि राष्ट्रीय उत्पादकता की वृद्धि कर तो सकते हैं लेकिन कौशल विकास कोई औद्योगिक संयंत्र लगाने जैसा काम तो है नहीं। ऐसा भी नहीं कि किसी एक सरकार  के कार्यकाल में यह कार्य पूर्ण हो सके। इसके लिए तो पीढ़ियों में और पीढ़ियों तक निरंतर बदलाव की आवश्यकता होगी उस गति के साथ जिस गति से तकनिकी बदलाव हो रहे हैं इसके आयामों की सम्पूर्णता सहित।

कम से कम राजनितिक , शैक्षणिक और सामाजिक व्यस्था इसकी निरंतरता बनाये तो रखे और इसकी गंभीरता भी। याद रखें यह एक मात्र राष्ट्रीय दायित्व है जिसके समाप्त होने की अंतिम तिथि कभी नहीं आएगी।

करुणेश
पटना
३०। ०५। २०१७   



आज की कविता ; आज के लिए

न्याय मरे न्यायधीश मरे न्यायालय लेकिन मौन । इतने सर हैं , इतने बाजू देखो लेकिन बोले, कितने - कौन ? सत्ता की कुंडी खड़काने आये जो दो -...