Tuesday, 16 May 2017

अंत में न्याय

अक्सर हम सुनते हैं कि अंत में न्याय की जीत हुई। आखिर में सत्य विजयी हुआ। यह वाक्य बार - बार सुनने को मिलते हैं। मेरे पास एक प्रश्न है। यदि अंत में सत्य और न्याय आते हैं तो उसके पहले क्या ? निश्चित ही वह और कुछ हो या न हो सत्य और न्याय तो नहीं ही होगा। इतना ही नहीं सत्य और न्याय शुरू में ही क्यों नहीं मिलते। क्या ये  इंतजार में बैठे रहते हैं किसी वी आई पी की तरह ताकि अन्याय और असत्य भीड़ में बैठकर तालिया बजाएं इनके लिए। न्याय और सत्य ही एकमात्र दो ऐसी चीजें हैं जिनके लिए समय का कोई मोल नहीं। 

देर लेकिन अंधेर नहीं की मानसिकता हमारे जीवन का स्थायी भाव बन गया है। 

इसे हमारी व्यवस्था का दोष कहें या मानवीय दुर्बलता। समझ में नहीं आता। व्यवस्था की बात करूँ तो मानवीय स्वाभाव का प्रश्न सर उठा लेता है और मनुष्य की दुर्बलताओं का जिक्र हो तो यह प्रश्न व्यवस्था के मकड़जाल में उलझ कर रह जाता है। 

आप इस प्रश्न को कैसे देखते हैं या इसे प्रश्न मानते भी है या नहीं - मैं नहीं जानता लेकिन मेरी समझ में यह प्रश्न विवेक का है। व्यक्तिगत विवेक का भी और सामूहिक विवेक का भी। 

विवेक का शिक्षण - प्रशिक्षण और अभ्यास हमारी शिक्षा व्यवस्था का अंग ही नहीं है। न ही परिवार में , न ही समाज में न ही विद्यालयों / महाविद्यालयों में। हमने जीवन में कुछ बातें यूँ ही मान ली हैं। इनमे एक बात यह भी कि विवेक उम्र के साथ आता है जैसे शिक्षालयों में मिलने वाली डिग्री जो कोर्स पूरा होने के बाद प्राप्त होती है। मैं यह नहीं समझ पाता कि पांच साल के बच्चे से उसके उम्र के अनुरूप विवेक की उम्मीद क्यों न की जाए उसके सोच और व्यव्हार में। मैं यह भी मानने को तैयार नहीं कि पचपन साल के व्यक्ति का विवेक संतृप्त (saturated) हो जाएगा। हमें बदलने के लिए तैयार रहना होगा हर क्षण हर पल क्योंकि समय तो बदलेगा ही हम चाहें न चाहें। देर लेकिन अंधेर नहीं की मानसिकता अक्सर देर तो करती ही है अँधेरे को गहरा और अंतहीन भी कर देती है। 

विवेक की समझ हमारे अंदर वैज्ञानिक तार्किकता से आती है। चाहे व्यक्तिगत विवेक की बात हो या सामूहिक विवेक की। इसका शिक्षण - प्रशिक्षण तो परिवार से ही प्राप्त हो सकता है जिसका अभ्यास विद्यालयों / महाविद्यालयों की परिधि में हो ताकि सामूहिक विवेक समाज में अपनी सार्थक और सक्रिय भूमिका अदा कर सके। 

करुणेश 
पटना 
१६। ०५। २०१७ 

Wednesday, 10 May 2017

सखी , वे मुझसे कहकर जाते !

कल रात (आज बुद्ध पूर्णिमा है) मैंने एक सपना देखा। 

आधी रात और ब्रह्म मुहूर्त के बीच का समय था। अचानक मुझे एक बूढी आवाज अपने कानों में सुनाई पड़ी। पहले मुझे यह मच्छर की भिनभिनाहट जैसी लगी। लेकिन अर्धचेतन में भी मैं दूसरे या तीसरे बार में शब्दों को स्पस्ट समझ रहा था। अरे यह तो राष्ट्रकवि मैथली शरण गुप्त रचित यशोधरा की एक पंक्ति थी जो मेरे कानों को सुनाई दे रही थी - " सखी , वे मुझसे कहकर जाते !" मुझे मेरे चौकने जैसा आभास हुआ। मैंने नींद में ही अपनी आँखों पर जोर दिया और अपनी पपनियों को आँखों पर से थोड़ा हटाया। मुझे मैथली शरण गुप्त दिखे। वही गांधी टोपी , थोड़ा लम्बोतरा चेहरा , चेहरे पर खीचड़ीनुमा दाढ़ी , थोड़े धंसे हुए गाल , खादी का कुरता और उसके ऊपर अण्डी , बाएं कंधे पर एक छोटा सा सफ़ेद गमछा। आधी खुली आँखों से ही मैं उनको पहचान तो गया था पर कोई और विचार मेरे मन में आता इसके पहले ही मुझे उनके पीछे गौतम बुद्ध खड़े दिखने लगे। गुप्त जी शायद अगली पंक्ति मुझे सुनाने ही वाले थे कि इसके पहले ही गौतम बुद्ध बोल पड़े। 

बुद्ध - कविवर !
गुप्त (पीछे मुड़ते हुए) - कौन ?
बुद्ध - मैं , गौतम। 
गुप्त - अरे आप तथागत। आपके दर्शनों से मैं कृतार्थ हो गया। कभी सोचा भी न था कि आपके दर्शन भी हो सकेंगे। 
बुद्ध - मुझसे मिलने की कभी इच्छा भी हुई क्या आपको ?
गुप्त - ऐसा न कहें भगवन। 
बुद्ध - क्यों ? आपकी भेंट अगर रामानुज लक्ष्मण से भी होती तो भी आप ऐसा ही व्यव्हार करते। 
गुप्त -  मैं कुछ समझा नहीं। 
बुद्ध - यही तो समस्या है। 
गुप्त - क्या ?
बुद्ध - नहीं समझना और क्या ?
गुप्त - पर कैसे ?
बुद्ध - समझने के लिए सम्यक विचार करना होता है। 
गुप्त - हाँ। 
बुद्ध - आपने यह किया ही नहीं। 
गुप्त - मुझे ऐसा तो नहीं लगता। लेकिन आप कहते हैं तो मान लेता हूँ। 
बुद्ध - मेरे कहने से मानने की जरूरत नहीं है। 
गुप्त - क्यों ? 
बुद्ध - अब मानने से भी कोई फर्क नहीं पड़ता। 
गुप्त - ज्ञान वह भी बुद्ध से, कभी भी मिले , सौभाग्य है। 
बुद्ध - तो "यशोधरा" लिखने से पहले इसका प्रयास करते। या कम से कम "उर्मिला" के बाद तो निश्चय ही करना चाहिए था। मगर सम्यक ज्ञान का सिद्धांत दांपत्य रस लेने वालों को कहाँ प्राप्त होगा। अपने दुःख की समानुभूति के लिए दूसरे के कंजुगल लाइफ को पब्लिक कर देना अनैतिक और अशोभनीय तो है ही असाहित्यिक भी है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने आपको ठीक ही चिरगंवार (चिरगावँ निवासी होने के कारण आपको दिया गया विशेषण ) कहा था। नागरीय जीवन पद्धति को समझना आपके वश में नहीं। 

गुप्त जी कुछ बोल पाते और मैं कम से कम दोनों के अभिवादन के लिए अपने हाथ जोड़ पाता इसके पहले  चिड़ियों की चहचहाट ने मेरा सपना ही भंग कर दिया। अब जब सपना ही टूट गया तो आगे क्या कहूँ। 

करुणेश 
पटना 
१०। ०५। २०१७ 

Thursday, 4 May 2017

दो बनाम पचीस

पाकिस्तान ने दो भारतीय सैनिकों के शवों को क्षत विक्षत किया अभी चंद रोज पहले। इस घटना के महज कुछ ही दिन पहले छत्तीसगढ़ के सुकमा में २५ सी आर पी एफ जवान  नक्सली हिंसा के शिकार हुए। इन दोनों घटनाओं पर सामन्य नागरिकों की प्रतिक्रया आश्चर्यजनक रूप से बहुत ही अलग है। जबकि परिणाम दोनों ही घटनाओं का एक जैसा रहा। यदि संख्या को आधार माने तो छत्तीसगढ़ की घटना पाकिस्तानी कुकृत्य से ज्यादा बड़ी प्रतीत होती है। लेकिन आम नागरिक इस घटना से सामन्यतः निरपेक्ष रहे जैसे कोई बड़ी सड़क या रेल दुर्घटना में २५ लोग मारे गए हों। 

हमारी मानवीय प्रतिक्रियाएं भी उत्पाद की तरह हो गयी हैं जिसे  हम उनके बिकने यानि  पढ़े - देखे - सुने - लाइक किये जाने की संभाव्यता के आधार पर अभिव्यक्त करते हैं। अभी प्रेस की आजादी के सन्दर्भ में टीवी पर किसी को यह कहते हुए सुना था कि हमने सोचने का ठेका भी औरों विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया को दे रखा है। बात मुझे तर्कपूर्ण और अर्थपूर्ण दोनों लगी। 

मुझे यह भी लगता है कि हम इकाई रूप में जितने अधिक सजग और सचेत होते हैं उतने ही कम सजग और सचेत सामाजिक सन्दर्भों में। समाज की उपयोगिता और उपादेयता का व्यवहारिक शिक्षण हमें आरंभिक दिनों में ही नहीं मिला है। परिणाम यह कि हम सार्थक सामाजिक इकाई होने की अपनी भूमिका अक्सर निभा नहीं पाते हैं। बचपन से ही हमने ऐसी आदतों का अभ्यास किया है कि बहुत बार न चाहते हुए भी हम वैसा व्यव्हार नहीं करते जैसा एक परिपक्व सामाजिक इकाई के रूप में किया जाना चाहिए। 

संचार की आधुनिक तकनीक संपन्न दुनिया के बेशक अनेकों फायदे हैं लेकिन इसने मन की निजता छीन ली है। हमारी कल्पनाओं के रूप रंग और आकार तक इनकी मात्र छायाप्रति बन कर रह गए हैं। तकनीक का उपयोग करते करते कब हम स्वयं तकनीक बन गए यह पता ही नहीं चला। अब तो हम या तो तकनीक का उपभोग करते हैं या तकनीक हमारा। तकनीक ने हमें दूसरों की दृष्टि से देखना सुनना बोलना और सोचना सिखाया है। सब एक दूसरे की छायाप्रति। नैसर्गिकता और मौलिकता तकनीक का कॉपीराइट है मेरा और आपका नहीं। 

ऐसे समय में जब अधिकांश पाकिस्तानी बर्बरता को कोस रहे हों तब भला २५ सी आर पी एफ जवानों की बात या फिर नक्सलियों की बात क्यों की जाए। शायद अधिकांश यह सोचते हैं कि छत्तीसगढ़ के मुकबले देश ज्यादा बड़ी चीज़ है। बात भी सही है। कम से कम इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के आईने में। 

करुणेश 
पटना 
०४। ०५। २०१७  

Wednesday, 3 May 2017

कब तक , किस हद तक

पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों के शवों को एक बार फिर क्षत विक्षत किया। यह कोई पहली बार नहीं है।  इसके पहले भी ऐसी घटनाएं हुई हैं। राजनैतिक प्रतिक्रियाएं भी पिछली बार की तरह ही हैं और नागरिक प्रतिक्रियाएं भी। 

प्रश्न केवल आत्म सम्मान का नहीं है। प्रश्न एकता और अखंडता का नहीं है। प्रश्न राजनैतिक इच्छाशक्ति की दुर्बलता का भी नहीं है। प्रश्न संभावित वैकल्पिक करवाई का है जिसके दो महत्वपूर्ण हिस्से हैं - कब तक और किस हद तक। 

मैं विदेश मामलों का कोई ज्ञाता नहीं हूँ और न ही मुझे  आतंरिक मामलों की विशेज्ञता हासिल है। लेकिन एक नागरिक की हैसियत से अपनी बात कहना चाहता हूँ। 

इस पूरी समस्या के तीन कोण हैं। पहला कश्मीर से १९४७ - १९९० तक  लगातार हिन्दुओं का पलायन जिसने बहु धार्मिक सामाजिक संरचना को पूरी तरह समाप्त कर दिया। दूसरा १९७१ के युद्ध के फलस्वरूप पाकिस्तान का विभाजन और पाकिस्तान के राजनैतिक जमात की विश्वसनीयता का पाकिस्तानी जनता में पूरी तरह ख़तम हो जाना। तीसरा चीन और अमेरिका की भारत विरोधी विदेश नीति और पाकिस्तान को वैश्विक , आर्थिक और सामरिक सहयोग और संरक्षण प्रदान करना। 

यह एक कड़वी सच्चाई है कि कांग्रेस और उनके नेताओं द्वारा लगातार मुस्लिम तुष्टिकरण किया गया। इसके अनेकों उदाहरण इतिहास में दर्ज़ हैं। लेकिन अब क्या हिन्दू तुष्टिकरण चला कर अतीत को सुधारा जा सकता है। समाधान समस्या का विपर्यय (Opposite) नहीं होता। सुनने में यह बात बेहद कड़वी लगे लेकिन मेरी समझ यह कहती है कि हमें कश्मीर में एक मुस्लिम भारत की सामाजिक संरचना कर देनी चाहिए राजनैतिक और सामाजिक रूप से और भारतीय संविधान के दायरे में ताकि यह मुस्लिम भारत पाकिस्तान के धर्म पोषित आतंकवाद का सामना कर सके। यानि इस्लाम बरक्स इस्लाम। मैं किसी आदर्श की बात नहीं कर रहा हूँ। हो सकता है ऐसा होने में एक पूरी पीढ़ी निकल जाए लेकिन एक राष्ट्र के सन्दर्भ में २५ - ३० साल कोई लम्बी समयावधि नहीं होती। 

पाकिस्तान के साथ आर्थिक और राजनैतिक सम्बन्ध विच्छेद कम से कम दो तीन दशकों तक। आतंरिक और बाह्य स्तर पर  राजनैतिक और आर्थिक नुकसान का जोखिम उठाते हुए अमेरिका से लालच की कूटनीति न करने का संकल्प क्योंकि चाहे कुछ भी हो अमेरिका का दक्षिण एशियाई हित पाकिस्तान की सत्ता और सैन्य व्यस्था के पोषण , संरक्षण और संवर्धन में ही निहित है। अब चीन की बात। हम एक साथ कई मोर्चों पर जोखिम नहीं उठा सकते। इसलिए यह आवश्यक है कि हमारी सामरिक तैयारी पाकिस्तान के बजाय चीन को सामने रख कर होनी चाहिए। चीन की कोशिश हमेशा ही यह होगी की युद्ध भूमि पाकिस्तान या भारत हो और चीन पाकिस्तान का मददगार। लेकिन चीन ऐसी किसी परिस्थिति में होना पसंद नहीं करेगा। परमाणु अस्त्र का भय न सिर्फ हमें होना चाहिए बल्कि उसी मात्रा में औरों को भी होना चाहिए। यह भय ही शक्ति संतुलन की तुला होगी। 

मैं नहीं जानता मेरी बात तर्कपूर्ण और व्यवहारिक है भी या नहीं। हमें यू एन सिक्योरिटी कौंसिल के मेंबरसिप को राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय उपलब्धि के मोह से मुक्त होने की नितांत आवश्यकता है। हमें अमेरिका से मिलने वाले वीसा का मोह भी त्यागना होगा। हम संप्रभु हैं और हम समर्थ हैं।  अपने दम पर राष्ट्र और इसके नागरिकों , सैनिकों को सम्मानपूर्ण जीवन देने में। यह निष्ठां राजनैतिक विवेक का स्थायी भाव होना चाहिए। बदलती रणनीतियां छोटी सफलताएं बेशक दिलवा दें लेकिन लम्बे काल खंड के लिए राष्ट्र को सबल नहीं बना सकती। और हाँ अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात एक राष्ट्र के रूप में संवैधानिक शीर्ष को किसी दूसरे देश की आंतरिक अशांति को वैदेशिक कूटनीति का हथियार बनाने से बचना चाहिए। 

करुणेश 
पटना
०३। ०५। २०१७  

Monday, 17 April 2017

किसकी जीत किसकी हार

आज की दुनिया में कौन जीत रहा है या किस की हार हो रही है। दो चार दस कदम के बाद सब तो हार ही जा रहे हैं। मैं कोई नकारात्मक छवि नहीं रख रहा हूँ। शान्ति बम गिराने से भी नहीं मिल रही है और आतंक फ़ैलाने से भी नहीं। मिल बैठकर बात करने की रस्म एक अंतहीन सिलसिला बन गया है। साम्यवाद , समाजवाद या पूंजीवाद या अलग अलग अंशों में मिश्रित इनका घालमेल कुछ भी तो इस दुनिया के लिए ठीक ठाक काम नहीं कर रहा। हम चाहे अनचाहे बेचैन वैश्विकता के जबरिया नागरिक बन गए हैं या बना दिए गए हैं। मुझे ऐसा लगता है जैसे बेचैनी जीत रही है और नागरिक हार रहे हैं। 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की दुनिया , शीत युद्ध के बाद की दुनिया , सोवियत रिपब्लिक के विघटन के बाद की दुनिया,नेल्सन मंडेला के बाद की दुनिया या फीदेल कास्त्रो के बाद की दुनिया आखिर क्या बदला है एक सामान्य नागरिक के लिए चाहे वह किसी भी देश का क्यों न हो। नागरिकों की स्थानीयता और इसके प्रति उनका भाव बोध किसी भी राष्ट्र के लिए नीति निर्देशक के रूप में काम कर रहा है क्या , यह सवाल अलग - अलग रूपों में अलग - अलग जगहों पर बार बार सर उठा कर खड़ा होता रहा है। चाहे इराक हो ,सीरिया हो,अफ़ग़ानिस्तान हो , कश्मीर - मणिपुर - नागालैंड हो , बलूचिस्तान हो , तिब्बत हो. उत्तर कोरिया हो या फिर छोटे - छोटे अफ्रीकन महाद्वीपीय राष्ट्र हो।  

किसी नागरिक के लिए राष्ट्र कितना महत्वपूर्ण होता है। क्या राष्ट्र बोध (मैं इसे राष्ट भक्ति से अलग मानता हूँ) व्यक्तिगत स्वतंत्रता में बाधक होता है या हो सकता है। क्या स्थानीयता का भाव बोध राष्ट्रीयता के भाव बोध का विपर्यय (Contrary) है।हाँ , नागरिकों का  राजनैतिक , भौगोलिक  और आर्थिक विस्थापन राष्ट्रीयता की भावनाओं के ह्रास और विखंडन के कारण अवश्य हो सकते हैं। अब चूँकि दुनिया तकनिकी रूप से अत्यधिक समृद्ध हो चुकी है विशेषकर सूचना और संवाद के क्षेत्र में तो वैश्विकता अब उतना बड़ा शब्द नहीं रहा जितना आज से चार या पांच दशक पहले हुआ करता था लेकिन ऐसा लगता है जैसे स्थानीयता पूरे तरीके से महत्वहीन बन गयी है और इसी लिए नागरिक भी। ऐसे महत्वहीन वैश्विक नागरिकों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि हो रही है। 

आईये इसी सन्दर्भ में वर्तमान वैश्विक नेतृत्व और भिन्न देशों की करनी - धरनी  का भी विहंगम अवलोकन कर लें। उत्तर कोरिया का उच्छृंखल एवं निरंकुश व्यवहार , अमेरिका की दबंगई , पाकिस्तान का दोगलापन , चीन की साम्राज्यवादी सोच और व्यवहार , अवसर की तलाश में घात लगाने को सन्नद्ध रूस , अफगानिस्तान , सीरिया , इराक और ऐसे ही न जाने कितने भू खंड जिन्हे राष्ट्र के रूप में सम्बोधन प्राप्त है में खौलता उबलता या रोता - सिसकता जन जीवन , समंदर में सीमाओं के दावे प्रतिदावे , पर्यावरण के शोधन एवं संरक्षण के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का विनाश या दोहन , यू एन ओ की अप्रभावी सक्रियता , ये सारी बाते किसी नागरिक को ध्यान में रख कर नहीं की जा रहीं हैं। यह सारा तो किसी भू खंड विशेष को समृद्ध से समृद्धतर बनाने के प्रयास भर हैं और वह भी मात्र सत्ता तंत्र के पोषण और दीर्घजीविता के लिए। 

ऐसी वैश्विक परिस्थिति में भारत में राष्ट्र भक्ति का उभार एक बेहद खतरनाक संकेत है। भारत के अस्तित्व के लिए भी और इसकी अस्मिता के लिए भी। भारत को अंधे राष्ट्रों के हाथ में दीपक देने की कोशिश नहीं करनी चाहिए वरना आग चाहे जहां लगे कम से कम उसकी आंच से हम भी झुलसेंगे। याद रखिये जल कर मर जाना उतना पीड़ा दायी नहीं होता जितना झुलस कर जिन्दा रहना।

करुणेश
पटना
१७। ०४। २०१७


Wednesday, 12 April 2017

चंपारण

साल १९१७। देश भारत। राज्य बिहार। जिला चंपारण। नील की खेती। तीनकठिया कानून। अंग्रेजी शासन। विधि की व्यस्था। विधि आधारित न्याय प्रणाली। किसानों की दुर्दशा। राज कुमार शुक्ल का बुलहटा। गाँधी का आगमन। विधि की व्याख्या। विधि की वैधता को चुनौती। तत्कालीन शासकीय एवं न्याय व्यस्था का सम्मान। किन्तु विचारों की दृढ़ता एवं अडिगता। स्थानीयता के साथ सहभागिता। अवरोध हीन  विरोध का कर्म। 

यही रहा होगा आज से सौ साल पहले जिसे आज हम चंपारण सत्याग्रह के नाम से जानते हैं। 

साल २०१७। देश भारत। राज्य कोई भी। जिला कोई भी। कैसी भी खेती। खेती - किसानी से सम्बंधित सारे कानून। संविधान का संप्रभु शासन। विधि की व्यवस्था। विधि आधारित न्याय प्रणाली। किसानों की आत्महत्या। आर टी आई एवं समाजिक कार्यकर्ताओं की कुलबुलाहट। ------------------- ?  धरना , प्रदर्शन। कर्ज माफी। सस्ते दर पर ऋंण की सुविधा के वादे। फिर कर्ज माफ़ी। स्थानीयता के साथ  सहभागिता का दिखावटी निभाव।  विधि एवं व्यस्था की अधकचरी समझ। विचारों की उग्रता। शाब्दिक उद्दंडता। दम्भी प्रतिरोध। 

फेसबुक , ट्विटर , व्हाट्सप्प , ब्लॉग पर सक्रिय हम जैसे लोग फैलते और बढ़ते चम्पारण (१९१७ वाला) के बस मूक साक्षी बनने को अभिशप्त हैं क्योंकि हमें गांधी का इंतजार है। बुलहटा भेज दिया है हम लोगों ने। देखें कब तक आते हैं गांधी हमारे पास , हमारे भीतर। 

करुणेश 
पटना 
१२। ०४। २०१७              

Tuesday, 11 April 2017

नए जवाहर

नए जवाहर आये हैं 
सबके सपनों में छाये हैं। 

छोटे - छोटे कई जवाहर 
उन से भी हैं बड़े जवाहर 
अख़बारों के पन्नों पर 
बिखरे सारे ढेर जवाहर। 

टी वी इनका 
एंकर इनके 
रूपया इनका 
सिक्के इनके 
बातें इनकी 
करनी इनकी 
ये ही केवल ,
भारत के सरमाये हैं। 
नए जवाहर आये हैं। 

डिजिटल दुनिया 
इनका कहती 
इनका सुनती 
बड़े सुहाने सपने बुनती 
सपनों में जो छेद  दिखाते 
उन पर ये हैं शोर मचाते 
चिल्ला - चिल्ली , हल्ला - गुल्ला 
गाली बकते भर भर कुल्ला 
राष्ट्रवाद में ये ही केवल ,
सारे तपे - तपाये हैं। 
नए जवाहर आये हैं। 

बात - बात में देश का रोना 
साफ़ करेंगे कोना - कोना 
पूछ रहे हैं रोज - रोज ये 
तुम तो मेरे साथ ही हो न ?
ऐसे हैं ये नए जवाहर 
अब क्या करना राम मनोहर ?

बाते करते रहे अभी तक 
गाँव गली और खेतों की 
मजदूरों और दलितों की 
पानी बानी और जवानी 
खो कर रह गए राम मनोहर। 
सोचो कैसे संसद में तुम 
आ पाओगे राम मनोहर। 

ऐसे हैं ये नए जवाहर 
कैसे हैं ये नए जवाहर। 

करुणेश 
(रचना तिथि - ०२। ०४। २०१७ )
पटना 
११। ०४। २०१७ 

आज की कविता ; आज के लिए

न्याय मरे न्यायधीश मरे न्यायालय लेकिन मौन । इतने सर हैं , इतने बाजू देखो लेकिन बोले, कितने - कौन ? सत्ता की कुंडी खड़काने आये जो दो -...